पूर्वजन्म की दिव्यचेतना की पुनःप्राप्ति के लिए मिले उत्तम जन्म को किस उदाहरण द्वारा समझाया गया है ?

        Shlok         Wednesday, 30 January 2019         82         0

राजा भरत, जिन्हें तीसरे जन्म में उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म मिला, पूर्व दिव्यचेतना की पुनःप्राप्ति के लिए उत्तम जन्म के उदाहरणस्वरूप हैं | भरत विश्र्व भर के सम्राट थे और तभी से यह लोक देवताओं के बीच भारतवर्ष के नाम से विख्यात है |

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या ६.४३ 
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प्रश्न १ : पूर्वजन्म की दिव्यचेतना की पुनःप्राप्ति के लिए मिले उत्तम जन्म को किस उदाहरण द्वारा समझाया गया है ?
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उत्तर १ : "राजा भरत, जिन्हें तीसरे जन्म में उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म मिला, पूर्व दिव्यचेतना की पुनःप्राप्ति के लिए उत्तम जन्म के उदाहरणस्वरूप हैं | भरत विश्र्व भर के सम्राट थे और तभी से यह लोक देवताओं के बीच भारतवर्ष के नाम से विख्यात है | पहले यह इलावृतवर्ष के नाम से ज्ञात था | भरत ने अल्पायु में ही आध्यात्मिक सिद्धि के लिए संन्यास ग्रहण कर लिया था, किन्तु वे सफल नहीं हो सके | अगले जन्म में उन्हें उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म लेना पड़ा और वे जड़ भरत कहलाये क्योंकि वे एकान्त वास करते थे तथा किसी से बोलते न थे | बाद में राजा रहूगण ने इन्हें महानतम योगी के रूप में पाया | उनके जीवन से यह पता चलता है कि दिव्य प्रयास अथवा योगाभ्यास कभी व्यर्थ नहीं जाता | भगवत्कृपा से योगी को कृष्णभावनामृत में पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के बारम्बार सुयोग प्राप्त होते रहते हैं |"
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सन्दर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता ६.४३, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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QA : Verse no. 6.43
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Question 1 : What example has been given in the verse to explain the birth in a good family for the revival of previous transcendental consciousness ?
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Answer 1 : "King Bharata, who took his third birth in the family of a good brāhmaṇa, is an example of good birth for the revival of previous transcendental consciousness. King Bharata was the Emperor of the world, and since his time this planet is known among the demigods as Bhāratavarṣa. Formerly it was known as Ilāvartavarṣa. The Emperor, at an early age, retired for spiritual perfection but failed to achieve success. In his next life he took birth in the family of a good brāhmaṇa and was known as Jaḍabharata because he always remained secluded and did not talk to anyone. And later on, he was discovered as the greatest transcendentalist by King Rahūgaṇa. From his life it is understood that transcendental endeavors, or the practice of yoga, never go in vain. By the grace of the Lord the transcendentalist gets repeated opportunities for complete perfection in Kṛṣṇa consciousness."
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Ref : Bhagavad-gita 6.43, Purport, Srila Prabhupada

Reporter: mohan

Tags: Bhagavad gita, shree krishna, karma, by garamnews

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